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कविता

 घर  —------         ‌रंजना शर्मा  काश! समय रहते बनाया होता  अपना कोई घर  उगायी होती कहीं कोई फुलवारी  भले ही की होती सिंचाई बेमन से ही सही  पर, फूल तो खिल ही जाते जब भी आता समय बसंत विहार का घर होता, तो बनता एक वाजिब वजह  नये पुराने तर्कों को  कर देना किसी भी पल एक सिरे से निरस्त  लौट कर आता घर, भरा-पूरा सा कहीं से भी कभी भी  भले आता बेमन सी सही  आँखें रहती टिकी  आँगन के पार द्वार से दूर जैसे रहतीं थीं बचपन में कभी माँ के ज़माने में  हर आहट में भर उठता घर  एक अव्यक्त झुरझुरी से  लौट कर आता जब मैं घर बार-बार  भले होता घर से जाना अनिश्चित  पर लौटना होता वहाँ,  हर बार की तरह एकदम सुनिश्चित  टाँग कर किसी निश्चित खूँटे पर दिन भर का बोझ सारा पोंछता आत्मरत होकर घर के परिचित पसीने को  भाँप लेता मिजाज घर का घर की ही तरह सुकून से टिका कर अपनी कही अनकही काया नि:श्चुप रात के सिरहाने  लिखता कोई अनुराग कथा  पी रहा होता सुबह चाय संग उसके  भले बेमन ही सही  पर...

झारखंड: जैसा कि देखा

 झाड़खंड  —--------            रंजना शर्मा   रात नींद खुली तो देखा, एक बड़ा भारी तिलस्म, प्रकृति यहांँ रच रखी है। रात के दो बज रहे हैं। आसमान मेघों से घिरा हुआ है। सघन मेघों के बीच थोड़ी छूटी छूटी सी जगहें बची हुई है। जिन्हें देखकर लगता है जैसे यहाँ के भूमिजों की कोई पुरानी झोपड़ी हो, जिसका छप्पर समय के साथ कहीं कहीं से उघर गया है और उस से चाँद की रौशनी अंदर आ रही है। फटे मेघों से घिरे आसमान में बादलों की परतों को हटाकर त्रयोदशी का चाँद अपनी पूरी सूरत लिए निकल आया है। जंगल और पहाड़ दोनों ने मुस्कुराते हुए एक दूसरे को देख कर जैसे कहा हो ‘लो आ गई तुम्हारी रौशनी।’ पास ही राढू नदी की अनवरत धारा एक मायावी आवाज करती हुई बही जा रही है। लोगों ने इस आवाज को भले कल-कल का नाम दिया है। पर मेरे जाने, इस वक्त चाहे इसका कोई भी नाम हो पर नदी का अनवरत बहना उसकी अपनी अभिव्यक्ति है। प्रकृति के इस अभिव्यक्ति को जन समाज अपने हिसाब से नाम दे देते हैं। वह चाहे भले कोई भी नाम दें, जिसमें न जाने कब से नदी के बहने वाली इस क्रिया का मात्र एक सहज संप्रेषनीय नामकरण...