झारखंड: जैसा कि देखा
झाड़खंड
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रंजना शर्मा
रात नींद खुली तो देखा, एक बड़ा भारी तिलस्म, प्रकृति यहांँ रच रखी है। रात के दो बज रहे हैं। आसमान मेघों से घिरा हुआ है। सघन मेघों के बीच थोड़ी छूटी छूटी सी जगहें बची हुई है। जिन्हें देखकर लगता है जैसे यहाँ के भूमिजों की कोई पुरानी झोपड़ी हो, जिसका छप्पर समय के साथ कहीं कहीं से उघर गया है और उस से चाँद की रौशनी अंदर आ रही है। फटे मेघों से घिरे आसमान में बादलों की परतों को हटाकर त्रयोदशी का चाँद अपनी पूरी सूरत लिए निकल आया है। जंगल और पहाड़ दोनों ने मुस्कुराते हुए एक दूसरे को देख कर जैसे कहा हो ‘लो आ गई तुम्हारी रौशनी।’ पास ही राढू नदी की अनवरत धारा एक मायावी आवाज करती हुई बही जा रही है। लोगों ने इस आवाज को भले कल-कल का नाम दिया है। पर मेरे जाने, इस वक्त चाहे इसका कोई भी नाम हो पर नदी का अनवरत बहना उसकी अपनी अभिव्यक्ति है। प्रकृति के इस अभिव्यक्ति को जन समाज अपने हिसाब से नाम दे देते हैं। वह चाहे भले कोई भी नाम दें, जिसमें न जाने कब से नदी के बहने वाली इस क्रिया का मात्र एक सहज संप्रेषनीय नामकरण तो हो सकता है, परंतु इस समय, सघन तिलस्म भरे इस रात्रि में सारे नामकरण चाहे वह नदी के बहाव की हो या स्तब्ध प्रकृति की, नामित करने की कोशिश सिर्फ इसके बहाव और स्तब्धता को सुनिश्चितिकरण करने की मानवीय कोशिश भर लग रही है। मध्य रात्रि में इस कमरे में जगकर जो आवाज इस समय कानों को सुनाई दे रही है, उसे सुनिश्चित तौर पर कल- कल तो बिल्कुल नहीं कहा जा सकता। बसंत के मौसम में पहाड़ी नदियों की क्षीणकाय काया, प्रकृति की अपनी चुनाव है। वर्षा ऋतु में अपने पथरीले तटों को भी बहाकर ले जाने को उद्धत राढू नदी की उन्मत्त आकांक्षायें में इस समय ठहराव है। जैसे संयमित गृहवधू गोधूलि बेला में अपने बनाए संसार को संरक्षित करने के लिए तत्परता से कार्रवाई कर रही हो। जीवन के प्रांत: काल की समस्त चपलताओं को अपने में समाहित और नियंत्रित करके अब इस लगा लगी के बेला में उस पार उतरने की धैर्यपूर्ण ताकिद जैसा हो, जैसे अपने सखि संग यात्रा पर हो।
कभी कभी आकस्मिक निम्न दाब के कारण जब कई दिनों तक बिना रुके लगातार बारिश होने लगती है और उससे जो आवाज कानों को सुनाई देती है। इस समय कमरे के भीतर निरंतर बूंदों के गिरने जैसी ही आवाज आ रही है। लग रहा है ज्यों बारिश की बूँदें अनवर बरसती जा रही है। इस मायावी रात में क्षीणकाय राढू के बहने की ठीक वैसी ही अंतहीन आवाज कानों में गूँज रही है।
चांँद इस तिलिस्म भरी रात के बहते समय में सबसे बड़ा खिलंदड़ी जादूगर बना हुआ है। अपने लुका छिपी के खेल में उसने सबको शामिल कर लिया है। मध्य रात्रि के इस निरव नि:श्चुप समय में, उसके चपल आह्वान पर, धरा पर मौजूद उसकी सारी सखियाँ खेल में शामिल हो गई हैं। ऐसे में फिर रात्रि के वातावरण का क्या कहना।(तब फिर उसे अपनी किसी भाषा में बांँधकर अभिव्यक्ति नहीं दे सकतें।) कुछ दूरी पर फैले घने जंगल के ऊँचे ऊँचे पेड़ सर उठाकर चाँद को ऐसे
देख रहें हैं जैसे वे सब हिप्नोटाइज कर दिए गए हों। सभी को सिर्फ अपनी ओर देखने के लिए चाँद ने जैसे बाध्य कर दिया हों और ये अब उन्हें चुपचाप एकटक देखे जा रहे हैं। मध्य रात्रिकालीन सम्मोहन ने उन्हें एक अनुशासित विशाल सेना वाहिनी में बदल दिया है। सारे पेड़ अस्त्र-शस्त्र से लैश होकर फिलहाल विश्राम की स्थिति में रूके हुए हैं। जैसे अभी अभी कोई बहुत बड़ी खबर या आदेश के लिए मुस्तैद खड़े हो। बहुत हल्की सी हवा भी अनुशासित तरीके से चल रही है। हवा में निर्जन पहाड़ी प्रदेश और नदी किनारे का जलीय ठंडक मौजूद है। जिससे शहर से छूट कर आए लोगों को रोमांच और ठंडक दोनों लग सकता है। दूर जहाँ तक लैंप पोस्ट विहीन सड़क और उसके आसपास निगाह जा रही है वहां तक सिर्फ जंगल ही जंगल है। चाँद की रौशनी में कंक्रीट सर्पीली सड़क सचमुच एक चौड़े साँप जैसी दिख रही है। दूर पहाड़ी की ऊंचाई पर रौशनी अपने आप हि।।।।।।दिखाई दे रही है। पर बताना मुश्किल है कि इस रौशनी का उत्स क्या है? जहाँ ठहरें है उसके ठीक पीछे कुछ दूर तक सब्जियों की क्यारियाँ लगी हुई हैं, जिसमें मूली, बैंगन, टमाटर फूल गोभी उपजाया गया है। कुछ मिर्च के भी पौधे हैं। छोटे छोटे टमाटर के पौधों में बहुत सारे टमाटर लगे हुए हैं। एकबारगी ऐसा लगा जैसे ये हरी भरी सब्जियाँ भी चाँद के गहरे साज़िश को समझ चुकी हैं और मुस्कुराकर पूरे मौन और रहस्यमयी वातावरण का स्वागत कर रहीं हैं।
नीचे से किसी के चलने की आहट आ रही है। गौर से देखने पर पता चला एक नीलगाय पुल के नीचे, नदी की ओर से जंगल की ओर जा रही है। बहुत कोशिश करने पर भी कुछ और दिखाई नहीं दे रहा था।
रात घनेरी थी। पर त्रयोदशी के चाँद की अठखेलियों ने दृष्टि से अदृष्ट को हल्का ही सही, दृश्यमान बना दिया था। (20.3.26)
क्रमशः
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