कविता
घर —------ रंजना शर्मा काश! समय रहते बनाया होता अपना कोई घर उगायी होती कहीं कोई फुलवारी भले ही की होती सिंचाई बेमन से ही सही पर, फूल तो खिल ही जाते जब भी आता समय बसंत विहार का घर होता, तो बनता एक वाजिब वजह नये पुराने तर्कों को कर देना किसी भी पल एक सिरे से निरस्त लौट कर आता घर, भरा-पूरा सा कहीं से भी कभी भी भले आता बेमन सी सही आँखें रहती टिकी आँगन के पार द्वार से दूर जैसे रहतीं थीं बचपन में कभी माँ के ज़माने में हर आहट में भर उठता घर एक अव्यक्त झुरझुरी से लौट कर आता जब मैं घर बार-बार भले होता घर से जाना अनिश्चित पर लौटना होता वहाँ, हर बार की तरह एकदम सुनिश्चित टाँग कर किसी निश्चित खूँटे पर दिन भर का बोझ सारा पोंछता आत्मरत होकर घर के परिचित पसीने को भाँप लेता मिजाज घर का घर की ही तरह सुकून से टिका कर अपनी कही अनकही काया नि:श्चुप रात के सिरहाने लिखता कोई अनुराग कथा पी रहा होता सुबह चाय संग उसके भले बेमन ही सही पर...